प्रभु शरण में आयें

सोमवार, 30 सितंबर 2019

हनुमान जी की आञ्जनेय मन्त्र साधना



।। श्री पार्वत्युवाच ।।
हनुमच्छावरं मन्त्रं, नित्य-नाथोदितं तथा ।
वद मे करुणा-सिन्धो ! सर्व-कर्म-फल-प्रदम् ।।
।। श्रीईश्वर उवाच ।।
आञ्जनेयाख्यं मन्त्रं च, ह्यादि-नाथोदितं तथा ।
सर्व-प्रयोग-सिद्धिं च, तथाप्यत्यन्त-पावनम् ।।


 

                                                              ।। मन्त्र ।।
“ॐ ह्रीं यं ह्रीं राम-दूताय, रिपु-पुरी-दाहनाय अक्ष-कुक्षि-विदारणाय,अपरिमित-बल-पराक्रमाय,रावण-गिरि-वज्रायुधाय ह्रीं स्वाहा॥”


विधिः- ‘आञ्जनेय’ नामक उक्त मन्त्र का प्रयोग गुरुवार के दिन प्रारम्भ करना चाहिए। श्री हनुमान जी की प्रतिमा या चित्र के सम्मुख बैठकर दस सहस्त्र जप करे। इस प्रयोग से सभी कामनाएँ पूर्ण होती है। मनोनुकूल विवाह-सम्बन्ध होता है। अभिमन्त्रित काजल रविवार के दिन लगाना चाहिए। अभिमन्त्रित जल नित्य पीने से सभी रोगों से मुक्त होकर सौ वर्ष तक जीवित रहता है। इसी प्रकार आकर्षण, स्तम्भन, विद्वेषण, उच्चाटन, मारण आदि सभी प्रयोग उक्त मन्त्र से किए जा सकते हैं।


विधिः- ‘आञ्जनेय’ नामक उक्त मन्त्र का प्रयोग गुरुवार के दिन प्रारम्भ करना चाहिए। श्री हनुमान जी की प्रतिमा या चित्र के सम्मुख बैठकर दस सहस्त्र जप करे। इस प्रयोग से सभी कामनाएँ पूर्ण होती है। मनोनुकूल विवाह-सम्बन्ध होता है। अभिमन्त्रित काजल रविवार के दिन लगाना चाहिए। अभिमन्त्रित जल नित्य पीने से सभी रोगों से मुक्त होकर सौ वर्ष तक जीवित रहता है। इसी प्रकार आकर्षण, स्तम्भन, विद्वेषण, उच्चाटन, मारण आदि सभी प्रयोग उक्त मन्त्र से किए जा सकते हैं।

यथा-
एतद् वायु-कुमाराख्यं, मन्त्रं त्रैलोक्य-पावनम् ।गुरु-वारे चाञ्जनेयं, समारभ्य सु-बुद्धिमान् ॥
कांक्षितां कन्यकां वाऽथ, युवाऽऽप्नोत्येव पार्वति !आञ्जनेयस्य पुरतो, ह्ययुतं जपमाचरेत् ॥
कज्जलं च रवौ ग्राह्यं, खाने पाने च पार्वति !दातव्यं त्रि-दिनं सम्यक्, स्वयमाकर्षणं भवेत् ॥
मन्त्रेणानेन देवेशि ! मन्त्रितं जल-पानतः ।सर्व-रोग-विनिर्मुक्तो, जीवेद् वर्ष-शतं तथा ॥
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰निशायाः कज्जलं तथा ।॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰ताम्बुलं चन्दनादिकम् ॥
दातव्यं शतधाऽऽमन्त्र्य, वन्यमामरान्तिकम् ।श्मशान-भस्म चादाय, सहस्त्रं मन्त्रितं प्रिये ॥
खाने पाने प्रदातव्यं, भोज्य-वस्तुनि वा प्रिये ! ।प्रातः-काले च जप्तव्यं, त्रि-सप्त-दिनमादरात् ॥
जिह्वा-स्तम्भनमाप्नोति, वाचस्पति-समोऽपि वा ।विप्र-चाण्डालयोः शल्यं, रवौ मध्यन्दिने प्रिये ! ॥
गृहीत्वा पञ्च-वर्णान् तु, कन्यका-सूत्र-वेष्टानात् ।निखनेच्छत्रु-गेहे तु, सद्यो विद्वेषणं भवेत् ॥
पक्ष-मात्रेण देवेशि ! पशु-पक्षि-मृगादयः ।तत्तद्-वैरि-भयं शल्यं, रवौ संग्रह्य बुद्धिमान् ॥
कीलं कृत्वा शत्रु-गेहे, निखन्योच्चाटनं भवेत् ।विप्र-चाण्डालयोः शल्यमर्के, चार्कस्य मूलकम् ॥
चतुर्विधेन सम्वेष्टय, नील-सूत्रेण मन्त्रयेत् ।निखनेच्छत्रु-गेहे तु, शयनागार-मध्यतः ॥
पक्षान् मारणमाप्नोति, नात्र कार्या विचारणा ॥



यह मन्त्र मेरे द्वारा अनुभूत है और यदि उचित रीति से किया जाये तो कार्य होना निश्चित जानिये और साधना की पूरी प्रक्रिया के लिये कृपया मुझसे व्यक्तिगत रूप से सम्पर्क करें।

रविवार, 29 सितंबर 2019

श्रीहनुमत्-मन्त्र-चमत्कार-अनुष्ठान



प्रस्तुत विधान के प्रत्येक मन्त्र के ११००० 'जप' एवं दशांश 'हवन' से सिद्धि होती है।

दीपक जला लें और संकल्पादि करने के पश्चात् हनुमान जी के मन्दिर में, 'रुद्राक्ष' की माला से, ब्रह्मचर्य-पूर्वक 'जप करें। कठिन-से-कठिन कार्य इन मन्त्रों की सिद्धि से सुचारु रुप से होते हैं।जप के बाद प्रतिदिन श्री हनुमान् जी को साष्टाङ्ग दण्डवत करें और पूजा के आसन के नीचे भूमिपर जल गिराकर तिलक करें उसके बाद ही जप समाप्त करें।




१-ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, वायु-सुताय, अञ्जनी-गर्भ-सम्भूताय, अखण्ड-ब्रह्मचर्य-व्रत-पालन-तत्पराय, धवली-कृत-जगत्-त्रितयाय, ज्वलदग्नि-सूर्य-कोटि-समप्रभाय, प्रकट-पराक्रमाय, आक्रान्त-दिग्-मण्डलाय, यशोवितानाय, यशोऽलंकृताय, शोभिताननाय, महा-सामर्थ्याय, महा-तेज-पुञ्जः-विराजमानाय, श्रीराम-भक्ति-तत्पराय, श्रीराम-लक्ष्मणानन्द-कारणाय, कवि-सैन्य-प्राकाराय, सुग्रीव-सख्य-कारणाय, सुग्रीव-साहाय्य-कारणाय, ब्रह्मास्त्र-ब्रह्म-शक्ति-ग्रसनाय, लक्ष्मण-शक्ति-भेद-निवारणाय, शल्य-विशल्यौषधि-समानयनाय, बालोदित-भानु-मण्डल-ग्रसनाय, अक्षकुमार-छेदनाय, वन-रक्षाकर-समूह-विभञ्जनाय, द्रोण-पर्वतोत्पाटनाय, स्वामि-वचन-सम्पादितार्जुन, संयुग-संग्रामाय, गम्भीर-शब्दोदयाय, दक्षिणाशा-मार्तण्डाय, मेरु-पर्वत-पीठिकार्चनाय, दावानल-कालाग्नि-रुद्राय, समुद्र-लंघनाय, सीताऽऽश्वासनाय, सीता-रक्षकाय, राक्षसी-संघ-विदारणाय, अशोक-वन-विदारणाय, लंका-पुरी-दहनाय, दश-ग्रीव-शिरः-कृन्त्तकाय, कुम्भकर्णादि-वध-कारणाय, बालि-निर्वहण-कारणाय, मेघनाद-होम-विध्वंसनाय, इन्द्रजित-वध-कारणाय, सर्व-शास्त्र-पारंगताय, सर्व-ग्रह-विनाशकाय, सर्व-ज्वर-हराय, सर्व-भय-निवारणाय, सर्व-कष्ट-निवारणाय, सर्वापत्ति-निवारणाय, सर्व-दुष्टादि-निबर्हणाय, सर्व-शत्रुच्छेदनाय, भूत-प्रेत-पिशाच-डाकिनी-शाकिनी-ध्वंसकाय, सर्व-कार्य-साधकाय, प्राणि-मात्र-रक्षकाय, राम-दूताय-स्वाहा।।
२-ॐ नमो हनुमते, रुद्रावताराय, विश्व-रुपाय, अमित-विक्रमाय, प्रकट-पराक्रमाय, महा-बलाय, सूर्य-कोटि-समप्रभाय, राम-दूताय-स्वाहा।।
३-ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय राम-सेवकाय, राम-भक्ति-तत्पराय, राम-हृदयाय, लक्ष्मण-शक्ति-भेद-निवारणाय, लक्ष्मण-रक्षकाय, दुष्ट-निबर्हणाय, राम-दूताय स्वाहा।।
४-ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय सर्व-शत्रु-संहारणाय, सर्व-रोग-हराय, सर्व-वशीकरणाय, राम-दूताय स्वाहा।।
५-ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, आध्यात्मिकाधि-दैविकाधि-भौतिक-ताप-त्रय-निवारणाय, राम-दूताय स्वाहा।।
६-ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, देव-दानवर्षि-मुनि-वरदाय, राम-दूताय स्वाहा।।
७-ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, भक्त-जन-मनः-कल्पना-कल्पद्रुमाय, दुष्ट-मनोरथ-स्तम्भनाय, प्रभञ्जन-प्राण-प्रियाय, महा-बल-पराक्रमाय, महा-विपत्ति-निवारणाय, पुत्र-पौत्र-धन-धान्यादि-विविध-सम्पत्-प्रदाय, राम-दूताय स्वाहा।।
८-ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, वज्र-देहाय, वज्र-नखाय, वज्र-मुखाय, वज्र-रोम्णे, वज्र-नेत्राय, वज्र-दन्ताय, वज्र-कराय, वज्र-भक्ताय, राम-दूताय स्वाहा।।
९-ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, पर-यन्त्र-मन्त्र-तन्त्र-त्राटक-नाशकाय, सर्व-ज्वरच्छेदकाय, सर्व-व्याधि-निकृन्त्तकाय, सर्व-भय-प्रशमनाय, सर्व-दुष्ट-मुख-स्तम्भनाय, सर्व-कार्य-सिद्धि-प्रदाय, राम-दूताय स्वाहा।।
१०-ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, देव-दानव-यक्ष-राक्षस-भूत-प्रेत-पिशाच-डाकिनी-शाकिनी-दुष्ट-ग्रह-बन्धनाय, राम-दूताय स्वाहा।।
११-ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, पँच-वदनाय पूर्व-मुखे सकल-शत्रु-संहारकाय, राम-दूताय स्वाहा।।
१२-ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, पञ्च-वदनाय दक्षिण-मुखे कराल-वदनाय, नारसिंहाय, सकल-भूत-प्रेत-दमनाय, राम-दूताय स्वाहा।।
१३-ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, पञ्च वदनाय पश्चिम-मुखे गरुडाय, सकल-विष-निवारणाय, राम-दूताय स्वाहा।।
१४-ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, पञ्च वदनाय उत्तर मुखे आदि-वराहाय, सकल-सम्पत्-कराय, राम-दूताय स्वाहा।।
१५-ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, उर्ध्व-मुखे, हय-ग्रीवाय, सकल-जन-वशीकरणाय, राम-दूताय स्वाहा।।
१६-ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, सर्व-ग्रहान, भूत-भविष्य-वर्त्तमानान्- समीप-स्थान् सर्व-काल-दुष्ट-बुद्धीनुच्चाटयोच्चाटय पर-बलानि क्षोभय-क्षोभय, मम सर्व-कार्याणि साधय-साधय स्वाहा।।
१७-ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, पर-कृत-यन्त्र-मन्त्र-पराहंकार-भूत-प्रेत-पिशाच-पर-दृष्टि-सर्व-विध्न-तर्जन-चेटक-विद्या-सर्व-ग्रह-भयं निवारय निवारय स्वाहा।।
१८-ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, डाकिनी-शाकिनी-ब्रह्म-राक्षस-कुल-पिशाचोरु-भयं निवारय निवारय स्वाहा।।
१९-ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, भूत-ज्वर-प्रेत-ज्वर-चातुर्थिक-ज्वर-विष्णु-ज्वर-महेश-ज्वर निवारय निवारय स्वाहा।।
२०-ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, अक्षि-शूल-पक्ष-शूल-शिरोऽभ्यन्तर-शूल-पित्त-शूल-ब्रह्म-राक्षस-शूल-पिशाच-कुलच्छेदनं निवारय निवारय स्वाहा।

शनिवार, 28 सितंबर 2019

तुलसीदासरचित हनुमान साठिका



जय जय जय हनुमान अडंगी । महावीर विक्रम बजरंगी ॥
जय कपीश जय पवन कुमारा । जय जगबन्दन सील अगारा ॥
जय आदित्य अमर अबिकारी । अरि मरदन जय-जय गिरधारी ॥
अंजनि उदर जन्म तुम लीन्हा । जय-जयकार देवतन कीन्हा ॥
बाजे दुन्दुभि गगन गम्भीरा । सुर मन हर्ष असुर मन पीरा ॥
कपि के डर गढ़ लंक सकानी । छूटे बंध देवतन जानी ॥
ऋषि समूह निकट चलि आये । पवन तनय के पद सिर नाये ॥
बार-बार अस्तुति करि नाना । निर्मल नाम धरा हनुमाना ॥
सकल ऋषिन मिलि अस मत ठाना । दीन्ह बताय लाल फल खाना ॥
सुनत बचन कपि मन हर्षाना । रवि रथ उदय लाल फल जाना ॥
रथ समेत कपि कीन्ह अहारा । सूर्य बिना भए अति अंधियारा ॥
विनय तुम्हार करै अकुलाना । तब कपीस की अस्तुति ठाना ॥
सकल लोक वृतान्त सुनावा । चतुरानन तब रवि उगिलावा ॥
कहा बहोरि सुनहु बलसीला । रामचन्द्र करिहैं बहु लीला ॥
तब तुम उन्हकर करेहू सहाई । अबहिं बसहु कानन में जाई ॥
असकहि विधि निजलोक सिधारा । मिले सखा संग पवन कुमारा ॥
खेलैं खेल महा तरु तोरैं । ढेर करैं बहु पर्वत फोरैं ॥
जेहि गिरि चरण देहि कपि धाई । गिरि समेत पातालहिं जाई ॥
कपि सुग्रीव बालि की त्रासा । निरखति रहे राम मगु आसा ॥
मिले राम तहं पवन कुमारा । अति आनन्द सप्रेम दुलारा ॥
मनि मुंदरी रघुपति सों पाई । सीता खोज चले सिरु नाई ॥
सतयोजन जलनिधि विस्तारा । अगम अपार देवतन हारा ॥
जिमि सर गोखुर सरिस कपीसा । लांघि गये कपि कहि जगदीशा ॥
सीता चरण सीस तिन्ह नाये । अजर अमर के आसिस पाये ॥
रहे दनुज उपवन रखवारी । एक से एक महाभट भारी ॥
तिन्हैं मारि पुनि कहेउ कपीसा । दहेउ लंक कोप्यो भुज बीसा ॥
सिया बोध दै पुनि फिर आये । रामचन्द्र के पद सिर नाये।
मेरु उपारि आप छिन माहीं । बांधे सेतु निमिष इक मांहीं ॥
लछमन शक्ति लागी उर जबहीं । राम बुलाय कहा पुनि तबहीं ॥
भवन समेत सुषेन लै आये । तुरत सजीवन को पुनि धाये ॥
मग महं कालनेमि कहं मारा । अमित सुभट निसिचर संहारा ॥
आनि संजीवन गिरि समेता । धरि दीन्हों जहं कृपा निकेता ॥
फनपति केर सोक हरि लीन्हा । वर्षि सुमन सुर जय जय कीन्हा ॥
अहिरावण हरि अनुज समेता । लै गयो तहां पाताल निकेता ॥
जहां रहे देवि अस्थाना । दीन चहै बलि काढ़ि कृपाना ॥
पवनतनय प्रभु कीन गुहारी । कटक समेत निसाचर मारी ॥
रीछ कीसपति सबै बहोरी । राम लषन कीने यक ठोरी ॥
सब देवतन की बन्दि छुड़ाये । सो कीरति मुनि नारद गाये ॥
अछयकुमार दनुज बलवाना । कालकेतु कहं सब जग जाना ॥
कुम्भकरण रावण का भाई । ताहि निपात कीन्ह कपिराई ॥
मेघनाद पर शक्ति मारा । पवन तनय तब सो बरियारा ॥
रहा तनय नारान्तक जाना । पल में हते ताहि हनुमाना ॥
जहं लगि भान दनुज कर पावा । पवन तनय सब मारि नसावा।
जय मारुत सुत जय अनुकूला । नाम कृसानु सोक सम तूला ॥
जहं जीवन के संकट होई । रवि तम सम सो संकट खोई ॥
बन्दि परै सुमिरै हनुमाना । संकट कटै धरै जो ध्याना ॥
जाको बांध बामपद दीन्हा । मारुत सुत व्याकुल बहु कीन्हा ॥
सो भुजबल का कीन कृपाला । अच्छत तुम्हें मोर यह हाला ॥
आरत हरन नाम हनुमाना । सादर सुरपति कीन बखाना ॥
संकट रहै न एक रती को । ध्यान धरै हनुमान जती को ॥
धावहु देखि दीनता मोरी । कहौं पवनसुत जुगकर जोरी ॥
कपिपति बेगि अनुग्रह करहु । आतुर आइ दुसै दुख हरहु ॥
राम सपथ मैं तुमहिं सुनाया । जवन गुहार लाग सिय जाया ॥
यश तुम्हार सकल जग जाना । भव बन्धन भंजन हनुमाना ॥
यह बन्धन कर केतिक बाता । नाम तुम्हार जगत सुखदाता ॥
करौ कृपा जय जय जग स्वामी । बार अनेक नमामि नमामी ॥
भौमवार कर होम विधाना । धूप दीप नैवेद्य सुजाना ॥
मंगल दायक को लौ लावे । सुन नर मुनि वांछित फल पावे ॥
जयति जयति जय जय जग स्वामी । समरथ पुरुष सुअन्तरजामी ॥
अंजनि तनय नाम हनुमाना । सो तुलसी के प्राण समाना ॥
। दोहा ।
जय कपीस सुग्रीव तुम, जय अंगद हनुमान ॥
राम लषन सीता सहित, सदा करो कल्याण ॥
बन्दौं हनुमत नाम यह, भौमवार परमान ॥
ध्यान धरै नर निश्चय, पावै पद कल्याण ॥
जो नित पढ़ै यह साठिका, तुलसी कहैं बिचारि ।
रहै न संकट ताहि को, साक्षी हैं त्रिपुरारि ॥
। सवैया ।
आरत बन पुकारत हौं कपिनाथ सुनो विनती मम भारी ।
अंगद औ नल-नील महाबलि देव सदा बल की बलिहारी 
जाम्बवन्त् सुग्रीव पवन-सुत दिबिद मयंद महा भटभारी ।
दुःख दोष हरो तुलसी जन-को श्री द्वादश बीरन की बलिहारी 
गोस्वामीतुलसीदासरचित हनुमान साठिका

शुक्रवार, 27 सितंबर 2019

॥ हनुमान चालीसा ॥






दोहा

श्रीगुरु चरन सरोज रज  निज मनु मुकुरु सुधारि ।
बरनऊँ रघुबर बिमल जसु  जो दायकु फल चारि ॥
बुद्धिहीन तनु जानिके  सुमिरौं पवनकुमार ।
ल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं  हरहु कलेस बिकार ॥


चौपाई

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर । जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥
राम दूत अतुलित बल धामा । अंजनिपुत्र पवनसुत नामा ॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमति के संगी ॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा ।कानन कुंडल कुंचित केसा ॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै ।काँधे मूँज जनेऊ साजै ॥
संकर सुवन केसरीनंदन ।तेज प्रताप महा जग बंदन ॥
विद्यावान गुनी अति चातुर ।राम काज करिबे को आतुर ॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया । राम लखन सीता मन बसिया ॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा ।बिकट रूप धरि लंक जरावा ॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे ।रामचंद्र के काज सँवारे ॥
लाय सजीवन लखन जियाये ।श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई ।तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं ।अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं ॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा ।नारद सारद सहित अहीसा ॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते ।कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा ।राम मिलाय राज पद दीन्हा ॥
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना ।लंकेस्वर भए सब जग जाना ॥
जुग सहस्र जोजन पर भानू ।लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं ।जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥
दुर्गम काज जगत के जेते ।सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥
राम दुआरे तुम रखवारे ।होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना ।तुम रच्छक काहू को डर ना ॥
आपन तेज संहारो आपै ।तीनों लोक हाँक तें काँपै ॥
भूत पिसाच निकट नहिं आवै ।महाबीर जब नाम सुनावै ॥
नासै रोग हरै सब पीरा ।जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥
संकट तें हनुमान छुड़ावै ।मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥
सब पर राम तपस्वी राजा ।तिन के काज सकल तुम साजा ॥
और मनोरथ जो कोई लावै ।सोई अमित जीवन फल पावै ॥
चारों जुग परताप तुम्हारा ।है परसिद्ध जगत उजियारा ॥
साधु संत के तुम रखवारे । असुर निकंदन राम दुलारे ॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता ।अस बर दीन जानकी माता ॥
राम रसायन तुम्हरे पासा ।सदा रहो रघुपति के दासा ॥
तुम्हरे भजन राम को पावै ।जनम जनम के दुख बिसरावै ॥
अंत काल रघुबर पुर जाई ।जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥
और देवता चित्त न धरई ।हनुमत सेई सर्ब सुख करई ॥
संकट कटै मिटै सब पीरा ॥जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥
जै जै जै हनुमान गोसाईं ।कृपा करहु गुरु देव की नाईं ॥
जो सत बार पाठ कर कोई । छूटहि बंदि महा सुख होई ॥
जो यह पढ़ै हनुमान चलीसा ।होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा ।कीजै नाथ हृदय मँह डेरा ॥


दोहा
पवनतनय संकट हरन। मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित। हृदय बसहु सुर भूप ॥